भुलाया जो तुमने, है इस कदर, यूँ..

के मानो, नहीं हम, कभी भी, मिले थे..


है नज़रों को फेरा, बिना कुछ बताए..

के मानो, नहीं गुल, कभी कुछ, खिले थे..


है वीरां सफ़र ये, ना मंज़िल कहीं पर..

के मानो, नहीं दो, कदम संग, चले थे..


अजब दास्ताँ, दिल की, क़िस्मत बनी है..

के मानो, नहीं कुछ कभी, सिल-सिले थे ..


के पत्थर से आँसु, टपकते नहीं है..

के मानो, नहीं दिल धड़क कर, जुड़े थे..


मिले थे यूँ हमसे, दिनों-दिन मिले थे..

के मानो, नहीं हम में, कुछ फ़ासले थे..


है ठहरा हुआ सब, ना बीतें ये घड़ियाँ..

के मानो, नहीं रूह, बदन बस हिले थे,..


है तनहा सा पंछी, शजर पर, टंगा सा ..

के मानो, नहीं संग, कभी क़ाफ़िले थे..


मुहब्बत ही की थी, ना थी दिल्लगी वो,..

के मानो, नहीं तुमसे, कब क्या गिले थे..


लिखे थे जो ख़त उन को अब भी हूँ पढ़ता..

के मानो, नहीं बातें, बस फ़लसफ़े थे.. 


चले थे, तो संग, तुम हमारे सफ़र यूँ…

के मानो, नहीं पर, जुदा रास्ते थे…


भुला कर, रक़ीबों के पहलू में बैठे..

के मानो, नहीं हम, कोई हादसे थे..

- मृदुल 


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