कल रात हिमारी आँखों में
कुछ ख़्वाब सलोने आए थे
कल रात बिना हम ठोकर के
कुछ चार क़दम चल पाये थे
कल रात हवा थी कुछ मद्धम
कल रात न था इस दिल में ग़म
कल रात बहुत मुसकाए थे
ना जाने किस बात इतराएँ थे
कल रात अजब ही मस्ती थी
कल रात हँसीं भी सस्ती थी
कल रात ख़ुशी के मेले थे
कल रात ना क़दम अकेले थे
कल रात किसी ने थमा था
कुछ पल को याद ना कुछ गम था
कल रात ना आसूँ रोए थे
कल रात जाने किस करवट सोए थे
कल रात तो कल ही बीत गयी
सपनों की होती रीत यही
ये सोच के मन झुँझलाता है
आख़िर ऐसा ख़्वाब क्यों आता है
जिसका ना सच से मेल कोई
बिन दर्द ना होता खेल कोई
अच्छा था सोते रह जाते
साँसों की लय हम बिसरते
सोते रह जाते तो शायद,
एक ख़्वाब सलोना ले जाते
बंद आँखों मैं क़ैद उन अशकों का,
लहराता दरिया ले जाते
मृदुल

