है हवाओं में अभी, 

फैली हुई इक, आग सी

है फ़िज़ाएँ भी अभी, 

मुरझाए से इक, बाग सी


है ये सच के आज मौसम, 

इस जगह, पतझड़ का है

राह में रोड़े पड़े है, 

रास्ता पत्थर का है


है अगर विश्वास मुझ पर

मान कहना तू प्रिया

कर भरोसा आप खुद पर 

साथ दूँगा मैं पिया


इस सफ़र से क्यों डरे तू?

ये सफ़र, दो दिन का है

कल खिलेगी जो सुबह, 

उस सुबह, उस दिन का है


राह मैं फिरसे खिलेंगे 

फूल और कलियाँ सनम

फिर से आएँगे वो मोसम 

फिर अंधेरा होगा कम


बस अभी कुछ और पल 

रखना है तुझको होसला

खुद पे कर विश्वास जानम

बस, कुछ कदम का फ़ासला..

-मृदुल