जनाज़े बहुत निकले हैं.. 

इन नज़रों के आगे..


ख़्वाहिशों के..

उम्मीदों के.. 

हौसलों के..


कौन जाने, कौन सा जनाज़ा.. 

धड़कन को ले गुज़रा..


अब तो बस साँसे हैं.. 

जो साथ दिये जा रहीं हैं..


वक़्त बेवक्त बस.. 

जिए जा रहीं हैं..


कुछ यादें ज़रूर है.. 

जो ज़िन्दा होने का अहसास देती है..


वरना जनाज़े को गुज़रे तो..

इक ज़माना हो चुका..


वरना जनाज़े को गुज़रे तो.. 

इक ज़माना हो चुका..

-मृदुल