ये ज़िंदगी कितनी सूनीकितनी तनहा..

कितनी वीरान नज़र आती है..


घर की दीवारें भी

सिर्फ़ मकान नज़र आती है


तुझको “ ज़िंदगी”.. हम “जान”...

यूँही नहीं कहा करते..


तुझ बिन ज़िंदगी, “ ज़िंदगी

बेजान नज़र आती है.. 

-मृदुल