ये ज़िंदगी कितनी सूनी, कितनी तनहा..कितनी वीरान नज़र आती है..घर की दीवारें भी,सिर्फ़ मकान नज़र आती हैतुझको “ऐ ज़िंदगी”.. हम “जान”...यूँही नहीं कहा करते..तुझ बिन ज़िंदगी, “ऐ ज़िंदगी”बेजान नज़र आती है..
ये ज़िंदगी कितनी सूनी, कितनी तनहा..कितनी वीरान नज़र आती है..
घर की दीवारें भी,सिर्फ़ मकान नज़र आती है
तुझको “ऐ ज़िंदगी”.. हम “जान”...यूँही नहीं कहा करते..
तुझ बिन ज़िंदगी, “ऐ ज़िंदगी”बेजान नज़र आती है..