ए-दिल ..मैं तो बस..
दिए कि उस जलती "लौ" को,
तेज़ हवा के थपेड़ों से, बचा रहा था।।
फिर क्यों ये हाथ जला?? पता ही नहीं..
दिल ने एक आह भर.. कहा..
गर करता था, तू जो इश्क़ ..
जलती उस "लौ" से
उसकी उस आग को..
उस तेज़ को अपनाता तू..
जो जल गया वो तेरा
"मोम" सा तन भी तो..
उस तपिश में
कुछ पल का सुकून पाता तू..
दिए कि "लौ" तो
तेरी शुक्रगुज़र थी शायद..
तेरे उन हाथो को
चूमने मचलती थी..
है बना "मोम" से
जो जिस्म तूने ओढ़ा है..
जो जल गया तो भला
"लौ" की कहा ग़लती थी..
जो जल गया तो भला
"लौ" की कहा ग़लती थी..
-मृदुल


