भीषण-फूहड़ जंगल में, मुरझाती डालों पर भैठा था
इंतज़ार है उसके आने का, मृत पत्तों से कहता था,
था अपार विश्वास मुझे के, एक रोज़ वो आएगी
ठंडी ठंडी मलय पवन सी, संग लिए उड़ जाएगी
कान वो होगी? कैसी होगी? इसका ना था कोई ज्ञान
वन मैं होती हर आहट पर, बटने लगता मेरा ध्यान
एक रोज़ इक झोंका आया, भाव्विभोर सा मन मुस्काया
मृत पत्तों ने रास रचाया, मन दीपक मैं जीवन भर आया
और मैं बेवक़ूफ़, उस झोंके संग उड़ आया
कुछ देर उड़ा, फिर मैंने पाया, धोका दे, झोंका रुक आया,
पंख काटे पक्षी सा मैं, धरती पर ओंधे मुँह गिर आया
उठने की अब शक्ति ना थी, ना मिटने की मुझमें चाह
जीवन जीना चाहता था मैं, फिर वैसे ही - “शून्य सा”
तपते रेगिस्तानों मैं अब, जलते टीलों पर भैठा हूँ
झोंकों में मैं उड़ ना जाऊँ, इस डर में मैं रहता हूँ
इंतज़ार है उसके आने का, मृत कण-कण से कहता हूँ
है अपार विश्वास मुझे के, एक रोज़ वो आएगी
निर्मल-झिलमिल सी प्रवाह में, मुझे बहा ले जाएगी
कॉन वो होगी? कैसी होगी, इसका ना है कोई ज्ञान
मरुभूमि की हर आहट पर, बटने लगता मेरा ध्यान
-मृदुल
This is a symbolic representation
- भीषण-फूहड़ जंगल- represents life at a point in time, seemingly a desolate forest..
- मुरझाती डाल - status of life at a point in time
- मृत पत्ते- days passing by
- झोंका- a specific event
- तपते रेगिस्तान - represents life post a point in time, seemingly a lifeless desert!
- जलते टीलों/मरुभूमि- status of life post a point in time
- मृत कण-कण- days as they now stand in the desert!

