इंतज़ार से अब तेरे, मोहब्बत सी हो गयी है.. 

मुंतज़िर रहे जो हम यूँ, मोहब्बत सी हो गयी है..


ना-गवार रहा ख़याल हर, अब तेरे लौटने का..

के अब तेरी कमी से, उल्फ़त सी हो गयी है.. 


तू कब कहाँ था मेरा, जो राह तेरी देखूँ..

रस्ता निहारने की, आदत सी हो गयी है..


इस दिल को यूँ दुखाना, फ़ितरत नहीं किसी की..

शीशे को तोड़ने की, रवायत सी हो गयी है.. 


तड़प ऐसी दी है, के अब दिल नहीं धड़कता..

ये नब्ज़ कुछ रुकी है, राहत सी हो गयी है..


नज़रें नहीं मिलातीं, ना छत, ना वो मुंडेरें..

उनको सबर से मेरे, गैरत सी हो गयी है.. 


कुछ दर्द के गुलों को, तख़्लीक़ दे रहा हूँ..

इन अश्कें मोतियों से, चाहत सी हो गयी है..


रहे सदा हमारे, वो फूल जिन में काँटें..

चुभेंगे दिल लगा कर, कुदरत सी हो गयी है..


तस्वीर तेरी देखूँ, हर पल नज़र उठाए..

है इश्क़ अब कहाँ ये, इबादत सी हो गयी है..


वो नज़्म जिसमें तेरा, बायाँ किया था मैंने..

पुर्ज़ा बनी पतंग सी, रुखसत सी हो गयी है.. 


हर राह जानती है, हर मोड़ जानता है..

ये बदगुमानी देखो, शोहरत सी हो गयी है..


है रात का सफ़र ये, हर शाम से शुरू है..

सहर मिलें ना शब की, क़िस्मत सी हो गयी है... 


घर फूँक कर सभी का, खुद रोटियाँ पकाना..

यही तेरे शहर में, ताकत सी हो गयी है..


मिला हमें जो चाहा, इक बार ज़िंदगी में..

फिर क्या हुआ ज़हर था, रहमत सी हो गयी है.. 


है सब यहाँ वीराना, इस छोर से ऊफुक तक.. 

हर आह है मुकम्मल, कयामत सी हो गयी है..


के नाम अब तुम्हारा, हर शय पे लिख दिया है.. 

तेरी अजब शहर पे, हुकूमत सी हो गयी है..


अब लिखूँगा, और क्या मैं, जवाब तेरा आए..

ये जुदाई जाने कब से, हक़ीक़त सी हो गयी है..


के मौन रह कर हँसना, नयी नहीं है आदत..

“मृदुल” तेरे शहर की, ये लत सी हो गयी है..

-मृदुल