इन अश्क़ों को कैसे रोकूँ?

ये आशिक़ी मैं बहतें हैं..


जिस सहर को पा ना सके..

उसी की दास्तान कहते हैं..


चाहते थे साथ तेरा..

मुस्कुराते गुलशनों का..


चाँदनी की बाँह में..

झिलमिलाते साहिलों का..


ख़्वाब देखा था इन्होंने .. 

रात के दमन तले..


साथ तेरे हम चलेंगे..

ना रहेंगे फ़ासले..


-मृदुल