पूनम के उस चाँद का जो

छत पर देखा था साथ तेरे,


इक टुकड़ा मेरे पास रहा

इक शायद अब भी साथ तेरे,


उस रात से अब तक रोज़ यहाँ

वो चाँद अधूरा खिलता है,


क्या तेरा चाँद भी टूटा-सा,

मुस्काता छत पर मिलता है?


है गुम साँसें उस रात से ही,

ना धड़का ये दिल सीने में


अब तुम ही कह दो चाँद मेरी,

कैसा रस ऐसे जीने में,


ना हाथ रहा इस हाथ में वो,

बस है अंधियारा साथ मेरे,


इक टुकड़ा मेरे पास रहा

इक शायद अब भी साथ तेरे,


है नींद नहीं अब रातों में,

के वो भी चुप चुप रहते हैं,


ना अंधियारों की रातों में,

उस मन की बातें कहते है,


उस रात को कितने तारों ने,

उस चाँद पे जान लुटाई थी,


मेरे चंदा को देख यहाँ,

उस चाँद ने आँख चुराई थी,


लेकर फिरता हूँ मैं तब से,

उस रात का केवल अक्स यहाँ,


अब हर पूनम पर हँस मुझ पर,

चंदा पूछे वो शक्स कहाँ?


बोलों कह दूँ उस चाँद से क्या?

के और ना मुझको भरमाएँ,


जो रूठा मेरा चाँद वहाँ,

जाकर के उसको समझाए,


सारा जग सुना छोड़ के वो,

इक रोज़ किसी दिन  जाएँ,


वो टुकड़ा ही लौटने सही,

छत पर फिर आकर मिल जाएँ,


के मेरा चाँद है रूखा सा,

है मुँह फेरेना बात करे,


इक टुकड़ा मेरे पास रहा

इक शायद अब भी साथ तेरे..

-मृदुल