ना जवाब तेरा अब आएगा..
ना सवाल भी हम उठाएँगे..
दरिया से बहते पानी है..
हम रीत वही निभाएँगे..
तुम मौन किनारों सा तकना..
हम लहर-लहर छू जाएँगे..
तट पर तुम रेत सी बिखरोगी ..
हम कण कण तुम्हें चुराएँगे ..
तुम गीली माटी सी कोमल..
मैं शोर लिए तूफ़ानों का..
तुम मूक हवा का इक झोका..
मुझमें उन्माद ज़मानों का..
तुम शीतल सहर किनारों पर..
मुझमें है समय की कोलाहल..
तुम यौवन में मुस्काती सी..
सैलाब यहाँ हर बीता कल..
तुम एक कहानी बचपन की..
मैं तर्क-वितर्क तजुर्बों का..
तुम इक शजर पर बैठी हो..
मैं हमराही फ़क़ीरों का..
है मेल अनोखा मेल है ये..
है संग मगर ना साथ हुए..
सब आठ पहर का जोड़ तो है..
सदियाँ बीती पर बात हुए..
-मृदुल


