एक नेता क्या क्या गुल खिलाता है..
एक नेता क्या क्या गुल खिलाता है..
कह ने को तो,
घर में भी आग लगा आता है..
जलानें के बाद चिल्लाता है..
जले पर नमक छिड़क आता है..
फिर कहता दमकल बुलवाओ..
जाली राख पर पानी बरसाओ..
बच्चू , अब तुम चोर को पकड़ कर लाओ..
किसी सीधे-साधे इंसान को सूली पर चढ़ाओ..
पर चुनाव जब सर पर आता..
भूखों को खाना पहुँचता..
अनपढ़ को शिक्षा दिलवाता..
स्त्रियों का वह मान बढ़ता..
दिन भर माइक पर चिल्लाता..
अंततः इन सभी क्रमों से..
कुर्सी को हथिया ले जाता..
कुर्सी बनती उनका मंदिर..
कुर्सी हि मस्जिद-गुरुद्वारा..
दिनभर कुर्सी-कुर्सी भजता..
वह देखो कुर्सी का मारा..
कुर्सी के ख़ातिर दंगे करवाता ..
कुर्सी के ख़ातिर बम फुड़वाता..
जाती पात कर आग लगता..
भाई को भाई से लड़वाता..
फिर झट पट सेना बुलवाता..
लोगों को राहत पहुँचता..
पाँच साल जब होने आता..
फिर देखो वह पल्टी ख़ता..
फिर लोगों के बीच वो आता..
फिर से माइक पर चिल्लाता..
सारे क्रम को फिर दोहराता..
फिर कुर्सी हथिया ले जाता..
एक नेता क्या क्या गुल खिलाता है ..
एक नेता क्या क्या गुल खिलाता है..
-मृदुल


