मंद-मोहक सा मुस्कुराकर...

छुपा लिए सारे भाव उसने...


सजा के यु पेश की सब खरोंचे...

छुपा लिए सारे घाव उसने...


नज़र मिलायी ना पल-घड़ी भर...

के वरना राज़े दिल खुल ही जाते...


मूँद कर के यु रख लीं पल्खें..

छुपा लिए सारे दाग उसने...


सब खुश है अब हँसता सा देख उसको...

के चाहिए क्या अब इस फ़िज़ा से?


जिगर पे रख कर के बोझ अपने...

छुपा लिए सारे एहसास उसने...


ना देख लें वक्त की वो निशानी...

मुखौटा माज़ी से था यु चुराया..


नक़ाब चेहरे पर अब चढ़ाकर...

छुपा लिए सारे बदलाव उसने...


कुछ दाग ऐसे है जो ना मिटते...

नहीं वो नासूर अब भरने वाले...


ज़माने से चाहे ये तुम छुपा लो...

छुपा ना पाओगे दाग मुझसे...


के मेरे भीतर भी कुछ ख़लिश है...

मैं भी हूँ रहता कुछ ग़म छुपाए...


बहुत सीं चोटें है इस सफ़र कीं...

किसे दिखायेंकिसे छुपाएँ...

-मृदुल