आज सोचा लोगों को अपनी आवाज़ सुनाऊँ..

कुछ ऐसा कहूँ के इक भीड़ सी जमाऊँ..


मानवता के इस बाज़ार में, दर्द भरी..

अपनी भी छोटी सी दुकान लगाऊँ..


दिल टटोलूँ, गला भर लाऊँ..

दर्द की कहानी, आँखों से सुनाऊँ..


तभी इक ओर से आवाज़ आयी

"फ़्री है .. फ़्री है... फ़्री है.. 

एक के साथ... एक और फ़्री है.."


इक हलचल सी हुई बाज़ार में, 

मानो होड़ लगी हो दुकानदार में,


सभी अपना माल बेच रहे थे.. 

कुछ छोटे.. कुछ बड़े.. 

अपनी अपनी ज़रूरत का 

समान देख रहे थे..


इक कोने में मूर्तिकार..

ईश्वर की मूर्ति बेच रहा था..

इक ओर राशिद.. 

दरगाह की चादर समेंट रहा था.. 


इक तरफ़ बोली लग रही थी..

इक मकान की..

क्या औक़ात यहाँ पर..

मेरी इस दुकान की??


पोटली बिछा, कुछ दर्द का 

सौदा करने निकल था..

बाज़ार की भीड़ में तो था 

पर बिलकुल अकेला था.. 


दर्द के सौदागर से भला 

कौन हिसाब लगाए?

इस चाकाचोंध भारी दुनिया में.. 

आँसुओ का भला कोई क्या मौल पाए?


बाज़ार में जहाँ ऊपर वाला 

मौल-भाव कर बिक रहा हो.. 

भला कौन वहाँ इंसान की क़ीमत बताए..

भला कौन वहाँ इंसान की क़ीमत बताए..

-मृदुल