क्या जाने क्यों? जब पूछूँ बस..
पहेलियों सी बुझाता है..
आशिक़ है वो मेरा गर तो,
वो क्यों नहीं बताता है..
अपनी प्यास, हर एहसास,
बस शब्दों में छुपाता है..
आशिक़ है वो मेरा गर तो,
वो क्यों नहीं बताता है..
सुनहरे अल्फ़ाज़, कुछ उपन्यास,
नित रोज़ यूँही लिख जाता है..
आशिक़ है वो मेरा गर तो,
वो क्यों नहीं बताता है..
कुछ रंग-बिरंगे ख़्वाब सायास (meaning - intentionally),
हर रोज़ पीरों, लुभाता है..
आशिक़ है वो मेरा गर तो,
वो क्यों नहीं बताता है..
ख़्वाहिशों भरी इक आस,
मन में भर, ललचाता है..
आशिक़ है वो मेरा गर तो,
वो क्यों नहीं बताता है..
ख़्वाब-ख़याल, कर प्रयास,
कलम से उकेर, ले आता है..
आशिक़ है वो मेरा गर तो,
वो क्यों नहीं बताता है..
-मृदुल


