है फैली अजब
विडम्बना ये
फिर चीख पड़ी
है अंजना ये
फिर मंथन
जग में, हुआ शुरू
फिर है आयी
घनघोर ऋतु
आओ फिर
खोजें नीलकंठ
करना है विष
फिरसे ग्रहण
फिर विष की
प्याली आयी है
फिरसे हलाहल
उपजाई है
महामारी ये
बीमारी ये
जीवन पर चलती
आरी ये
है जनजीवन
सब तीतर-बितर
सारा जग
त्राही-त्राही ये
लड़ता बचपन
लड़ता योवन
हैं वृद्ध भी
लड़े लड़ाई ये
ना रूप स्वरूप
ना रंग भेद
ना जात भी
देखे भाई ये
ओढ़े बुत ने
रंगीन कफ़न (*things referred in the last stanza)
है श्वेत सी
चादर लायी ये
आओ फिर
खोजें नीलकंठ
करना है विष
फिरसे ग्रहण
है विश्व यहाँ
चिंता में पड़ा
कैसी विपदा
है आयी ये
अपने छूटे
रस्ते रूठे
यूँ अब जीना
दुखदायी रे
कितने तड़पे
कितने गुज़रे
गिनती में कहाँ
समाई ये
कितने अपने
पल भर में चले
अरबों ने जान
गवायी रे
शमशान भी
छोटे पड़तें है
था कब सोचा
रे भाई ये
आओ फिर
खोजें नीलकंठ
करना है विष
फिरसे ग्रहण
सुख्श्म विषाणु
ने बस इक
बुत की औक़ात
बताई रे
था बना फिरे
ब्रह्मांड विजय
शामत मनुष्य
की लायी ये
थे तुम भक्षक
इस पृथ्वी पर
ये पाठ हमें
सिखलाई ये
इस जग मंथन
में मानव ने
है विष की प्याली
पायी रे..
हे नीलकंठ
हे सच्चिदानंद
फिर हर लो तुम
कठिनाई ये
अब तुम ही
पार लगाओगे
फिर नीलकंठ
कहलाओगे
आओ फिर
खोजें नीलकंठ
करना है विष
फिरसे ग्रहण
-मृदुल


