आँखेंनिष्कपट सी वो आँखें..

देखती हैं जितनादिखा भी देतीं है..


लबों से हँसकरचाहे झूठ कह लो..

यें निश्छलसब सच बता देतीं हैं.. 


ख़लिश जिगर कीझलकती है इनमें..

हर दर्द का दिल केये पता देतीं हैं.. 


देखती हैं जितनाये आँखें तेरी.. 

कम्बख़्त ये उतना ही दिखा देतीं है..


भरीं भरीं सीं हैंये तेरी नज़रें..

जाने कितने तूफ़ान बसा लेतीं हैं..


देखती हैं जितनाये आँखें तेरी.. 

कम्बख़्त ये उतना ही दिखा देतीं है..


दिल ये चाहेछूकर के देखूँ..

क्या वाक़ई ये समंदर छुपा लेतीं हैं?


देखती हैं जितनाये आँखें तेरी.. 

कम्बख़्त ये उतना ही दिखा देतीं है..


है आईनें सी, साफ़-पारदर्शी..

हर दर्दहर नासूर, का बयाँ देतीं है..


देखती हैं जितनाये आँखें तेरी.. 

कम्बख़्त ये उतना ही दिखा देतीं है..


वो पल्खें तेरीकरती है कोशिश..

उमड़ते सैलाब को वो दबा देतीं है.. 


देखती हैं जितनाये आँखें तेरी.. 

कम्बख़्त ये उतना ही दिखा देतीं है..


अकेले रहें तब हैअहसास मुझको..

बादल सी बरसबोझ गिरा देतीं हैं..


देखती हैं जितनाये आँखें तेरी.. 

कम्बख़्त ये उतना ही दिखा देतीं है..

-मृदुल