अधूरी सी कुछ ये मुलाक़ात..
करनी है कुछ तुम से बात..
पास नहीं फिर भी हो साथ..
बनते-संवरते कुछ जज़्बात..
एक खिली मुस्कान लिए..
सुंदर स्वप्न का राग सिये..
हर क्षण करती हो प्रयास..
अनोखा सा है वो अन्दाज़..
होगा हर परिश्रम सफल..
मिलेगा ज़रूर श्रम का फल..
रौनक सी मन में बिखेर..
उज्जवल कल के स्वप्न उकेर..
कुछ बतलाती, कुछ शर्माती..
कुछ जीवन के गीत सुनाती..
प्रेम नहीं जिस्मानी अपना..
लगे सभी रूहानी सपना..
डर लगता है, जाग ना जाऊँ..
ख़्वाब ये सुंदर ना बिसराऊँ..
कहूँ मैं कैसे कौन हो मेरे..
स्पर्श करूँ मैं अश्रु तेरे..
मेल है दिल का, मेल रूमानी..
संग तुम्हारे शाम बितानी..
है अधूरी सी ये मुलाक़ात..
क्या तुमको कल होगी याद..
क्या ये कल धुँधलाएगी..
अतीत सी गुम हो जाएगी..
क्या ज़िंदगी फिर से..
वही हक़ीक़त दुहराएगी?
शायद हाँ, शायद नहीं..
शायद पता नहीं!
-मृदुल

