सारे तारे टूट क्यों गए?
हर इक पर.. इक ख़्वाब बुना था..
रात ये काली रुठ क्यों गयी?
हमने बस सपना देखा था..
और अंधेरा कितना होगा?
परछाई भी साथ नहीं है..
काली रातें बहुत है देखीं
इससे काली रात नहीं है
मन का अंधेरा सन्नाटे को..
चीर.. ये शोर मचाता है..
काली रात के अंधियारे को..
काजल लेप लगाता है..
दीपक की लौ भी, अब बुझ कर..
कालिक और बढ़ाती है..
जीवन में जाने किस कारण से
काली रात ये आती है..
जीवन में जाने किस कारण से
काली रात ये आती है..
-मृदुल


