टक टक निहारती उम्मीदों वाली नज़रें,,,
तन ढ़कने को,,
बचाने खुद को उन नज़रो से,,
जो नज़रे कम,,
सवाल ज्यादा हैं..
बचा कर उनसे,,,
देख देख कर हौसला बनाया,,
उठा लिया फिर एक कपड़ा बिना मोल के,,
क्या मोल तन से बड़ा हुआ..?
जो न दे सकें खुद का कपड़ा,,,
फिर क्यों निकाल दिया ईश्वर का दिया कपड़ा..??


