Poetry 1 min read 610.6K reads

अंतहीन भोग


भोगते ये धरा,इस से बने खिलौने,भरी क्या ये अंतहीन खोह,जो अपने पांच मुंह खोलेसब ग्रास करने को है,बुझी क्या ये आग,जो सब भस्म करने को है,बदले में पानी से भीन बुझने वाली प्यासऔर धुएं में ओझल होने को है ।

Read more Earn more Learn more