कल क्या होगा इसमें आज को खो रहा हूं मैं 
कुछ और होने की कोशिश में कुछ और हो रहा हूं मैं
 क्यों अब यह शाम गुनगुनाती नहीं 
क्यों रात मुझे देख कर मुस्कुराती नहीं 
जागने की ख्वाहिशों में अकेला सो रहा हूं मैं 
कुछ और होने की कोशिश में कुछ और हो रहा हूं मैं
 क्यों यह हवाएं मुझ से मुंह फेर लेती हैं
 क्यों भीड़ में तनहाई मुझे घेर लेती है 
इस शख्सियत के किरदार को क्यों ढो रहा हूं मैं
 कुछ और होने की कोशिश में कुछ और हो रहा हूं मैं 

क्यों अब मेरे आसमानों में कोई परिंदा नहीं है
 क्यों जिंदा मुझ में कुछ भी जिंदा नहीं है
 ऐसा क्या है जिसे पाने को सब कुछ खो रहा हूं मैं
 कुछ और होने की कोशिश में कुछ और हो रहा हूं
 मैं इन बेबस आंखों में अब भी उम्मीद बाकी है 
हार का कोई वजूद नहीं बस जीत बाकी है 
जख्मी है पर पर उड़ाने बेहिसाब हैं 
बेचैन दिनों में अभी सुकून की नींद बाकी है
वक्त के दरिया में खुद को धो रहा हूं मैं
 तलाश में हूं खुद की तो खुद को खो रहा हूं मैं