तुमने लौ को छुआ वह माणिक बन गई बेशुमार मनके तुम्‍हारी मुट्ठी में सिमटते चले गए मुझे बहुत देर बाद पता चला कि दरअसल लौ से तुम्‍हारे हाथ जल गए थे तुमने जले पोर मुझसे छिपाने को मुट्ठियां बन्‍द कर ली थीं .... !
उस दिन जब तुमने जो पत्‍थर उछाला आकाश की तरफ तुम्‍हारे स्‍पर्श की नियति थी या कि उस पत्‍थर की वह हवा में ही फूल बन गया बहुत देर बाद जब वह पत्‍थर नीचे गिरा उस पर तुम्‍हारे खून के धब्‍बे थे ....! सिहर गया हूं कि आज छू लिया तुमने मुझे मुझे तुम्‍हारे हाथ देखने हैं, अभी, इसी वक्‍त ... !