ज़मी पर तबाही, आसमान में बारूद भरा है,
हर तरफ मौत का शिकंजा पड़ा है,
क्यू कहा तूने की कत्ल कर दो बेगुनाहों को,
अगर नही बोला तो फिर क्यों चुपचाप खड़ा है,
सरहदे बनाई किसने, कौन कर के सियासत, छिपा है,
देखता है दूर कही आराम-गाह से अपनी, यहां लाशों का अंबार बिछा है।
हदे हवानियत की टूट चुकी है ,
इंसान इंसानियत को रौंदे खड़ा है।
और तुम गजब कहते हो बे हया, इस दुनिया में सुकून बड़ा है।

