मैं रोता रहा उसके लिए जो मेरा कभी था ही नहीं,जो बन सकता था मेरा उनसे मैं फिर मिला ही नहीं।फिर जो ढली जिंदगी की शाम तो बीता सब याद आया,जो हक से था मेरा वह अब रहा ही नहीं।।। कलम –ए–राख ।
मैं रोता रहा उसके लिए जो मेरा कभी था ही नहीं,जो बन सकता था मेरा उनसे मैं फिर मिला ही नहीं।
फिर जो ढली जिंदगी की शाम तो बीता सब याद आया,जो हक से था मेरा वह अब रहा ही नहीं।।
। कलम –ए–राख ।