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अंतर्द्वंद

ये किस मुहाने खड़ा मैं
जहाँ न जाने का मार्ग है
न निकास का द्वार है पर
जाने को हैै पग आतुर

विचित्र मनोभावोंं की भूमि पर पड़ा मैैं निर्विकार 
शून्य सी जड़ता का
हो रहा संचार

स्वयं में ही बिखरा हूँ
दो पाटों के बीच
दो धुरी के बीच
नित्य स
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