जब चलो अकेला , बिना ठहर
लक्ष्य हो ओझल , कठिन डगर
जब तुम्हें तड़ित , भयभीत करे
जब बरखा, शीत या आग झरे
जब खड़ा हो डर बनकर आफत
जब शूल चुभे और पग लतफत
जब श्वेद बहे , हर साँस थके
बस चलते जाना , बिना रुके !
बस चलते जाना , बिना रुके !
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विश्वास में विष , जब वास करे
या नियती सब कुछ नाश करे
जब समय रूप बिकराल धरे
चाहे धरा फटे , आकाल परे
या खड़ा हो काल स्वयं आ कर
मत शीश नवाना, घबरा कर
भीड़ जाना तुम बिना झुके
बस चलते जाना , बिना रुके !
बस चलते जाना , बिना रुके !
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जब जग सारा परिहास करे
जब धैर्य, धर्म अरु सखा परे
जब लगने लगे “सब खो दूँगा..
अपनी किस्मत पर.. रो दूँगा”
है कसम तुम्हें , मत रोना तुम
मत लक्ष्य से विचलित होना तुम
हर मोल चुकाना , अश्रू के..
बस चलते जाना , बिना रुके
बस चलते जाना , बिना रुके !
– अशोक कुमार ‘मतेथूवाला’


