एक चिराग़ उम्मीद का चलो हम जलाते है।अपनी क़िस्मत का चलो ज़रा आज़माते है।साहिल पर खड़े हो कर तुम रो रहें कब से,अपनी कश्ती को दरिया से चलो हम लड़ाते है।मारूफ आफताब
एक चिराग़ उम्मीद का चलो हम जलाते है।अपनी क़िस्मत का चलो ज़रा आज़माते है।साहिल पर खड़े हो कर तुम रो रहें कब से,अपनी कश्ती को दरिया से चलो हम लड़ाते है।
मारूफ आफताब