अंतर्मन के झरोखों से झाँकती इक नदी में बहते
श्वेत कमल मेरी अनुभूति से निकले शब्दों और शब्दों से निकलती -
छूटती एहसासों की स्याही से रँगे -
पुते उन ख़तों को समेटे हुए हैं
जिन्हें लिखा था मैंने
न तो किसी प्रेमी की विरह - पीड़ा में,
न ही किसी यात्री से मिलन की उत्सुकता में।
यह वे ख़त हैं जिन्हें मिला न
अपने लिए कोई ऐसा डाकघर जो पहुँचा सकता उन्हें शाँति,
प्रेम व सद्भावना के पते पर।
अतः श्वेत कमलों से लिपटकर प्रतीक्षारत हैं
यह कि कभी न कभी तो नदी की धाराएँ श्वेत कमलों संग बहा ले जाएँगी
उन्हें उस ओर जहाँ तुम रहती हो,
उस दिशा में जहाँ धर्म ,
राजनीति या जीवन दर्शन की बातों का गूढ़ ज्ञान न सही,
पर ज़िन्दगी को जीना जानते हैं लोग ;
ऐसा जीना जो मरने के बाद भी ख़त्म न हो कभी।
और कह सकती हूँ
मैं बड़ी सरलता से कि मेरे ख़त भी उस दिशा में ज़रूर पहुँचेंगे
जहाँ जीवंतता से भरे रहना चाहते हैं सभी,
बिल्कुल तुम्हारी तरह और चाहें भी क्यूँ न ?
बस एक कोशिश की बात है और इतना मुश्किल भी नहीं तुम्हारी तरह बन पाना,
क्योंकि तुम तो हमारे भीतर ही हो,
बस भ्रमजालों को हटाने की ज़रूरत है और ठीक उसी क्षण यह सत्य भी आत्मा की तरह अनावृत,
परमात्मा की तरह जागृत हो जाएगा
कि अंततः हम सबमें एक नीरजा होती है.