ये बंद कमरा,

जिसकी चौखट पर जमाने से न कोई पैगाम आया।

ये गुस्ताख हवा का झोंका बेमतलब ही दस्तक देता है।।

इस रोशनदान को चीरती हुई किरण प्रभात का बिगुल बजाती है। और ढलती हुई रौशनी निशा को दावत पर बुलाती है।।

कभी इन किताबों के पन्ने पलट कर ,

कभी दीवारों पर लगे मकड़ी के जाल उलट कर।

कभी शब्दों को श्याहि मे सान कर लिख लेता हूँ और

कभी सिसकता हुआ इस कुर्सी पर ही सो लेता हूँ।।

अब तो अपनी ही आवाज सुनकर सुकून सा मिलता है,

जो आईने से बात करता हूं।

क्या महफिल क्या तन्हाई ,

अब तो अकेले ही जशन कर लेता हूँ ।।

ये बंद कमरा जिसकी दीवारों पर मेरी जवानी की पुताई है और फर्श पर गिरी अश्को की सिंचाई है ।

कभी न कभी बैसाख तो आएगा।।

ये बंद कमरा जिसकी चौखट पर जमाने से न कोई पैगाम आया । पर ये गुस्ताख हवा का झोंका एक दिन तो मेहनत की फसल को लहलहाएगा।।

ये बंद कमरा एक दिन तो खुल ही जाएगा ।।।।।

                                                          - मानवेन्द्र राना