जो मुट्ठी में दबाए जीते रहे,
बस जुड़ गए कुछ सिक्के खजाने में।
संजोने में और गंवाने में,
जमाने बीत गए जाने क्या कमाने में।।
अब जर्जर हैं वो आशियाने,
जो संवारे थे कभी खून पसीने से।
बिखर गए सब घर परिवार,
पाला था जिनको लगाकर सीने से।।
उनको दुर्भाग्य का रोना रोते देखा,
कहते थे जो हाथ में किस्मत की रेखा।
शाश्वत के भ्रम में आनंदित,
स्वर्ण महलों को हमने मिट्टी बनते देखा।।
तुझे आज ये तेरा रास आएगा,
पर ये आज भी कल बीत जाएगा।
कल की राह में जो देखे सपने,
पथिक बस क्षणभंगुर ही तो पाएगा।।
- मानवेंद्र सिंह राना


