अंतिम सफर मे भी वो सम्मान न मिला।

वक़्त आया कि शवो को समशान न मिला।।

तालाबंदी मे चले बेबस अपने घर की राह।

भूक प्यास तो मिली पर जन्मस्थान न मिला।।


चीरती है सन्नाटों को हर तरफ दर्द भरी चीत्कार।

आलाप विलाप मे कोइ मोहल्ला सुनसान न मिला।।

महामारी मे दूरियों ने दी कैसी ये दस्तक।

सांत्वना तो मिली दुख बांटने कोई इंसान ना मिला।।


पहरों से भी जो थम ना सका सासों में जहर।

चेहरों को भी ढक कर कोइ समाधान न मिला।।

त्रासदी के भयावह मंजर मे भी दिखे कुछ अज्ञानी।

बरस की सजा से भी जिन्हें कोइ आत्मज्ञान ना मिला।।

  

                         - मानवेन्द्र राना