रात दिन चला है तू , थक कर नही रुका है तू।
पौरुष ये तेरा कह रहा ,अब लौह बना है तू।
गंतव्य तेरा धुंधला सा दिख रहा अब रुक नही।
वीरता का अपने लहू से इतिहास लिख रहा है तू।
मेघ अब गरज रहे , घाव तेरे भर रहे।
जीत की खुशी में देख फूल कैसे खिल रहे।
भीगे नयन ये बोलते हैं की बहुत सहा है तू।
नमन ए वीर जो फिर बढ चला है तू।।।।
- मानवेन्द्र राना


