मुहिम थी वो उन टूटे दिलों की,

गूंज की जिसने बेवफाई का तख्त-ए-ताज हिला डाला।

जाग गई थी आवाम दिल-ए-जान से,

फरेबी इश्क़ ने बागी का नाम दे डाला।

तोड़ दी आशिकों ने गुलामी की जंजीर-ए-बेवफाई,

मोहब्बत के इतिहास का एक नया अध्याय लिख डाला।

डूबा था जश्न-ए-आजादी में इश्क़-ए-वतन,

कम से कम बेवफाई ने क्रांतिकारी तो बना डाला।।।

- मानवेन्द्र राना