भय भेद से कोसों दूर
अपनेपन से भरपूर
कुछ उपहास सा करती थी
एक बच्चे की मुस्कान।
बारिश में बहती नाव-कश्ती
खुशियाँ देखो कितनी सस्ती
पर लगती थी अनमोल
एक बच्चे की मुस्कान।
बादल में आकार देखकर
मिट्टी का बाज़ार देखकर
मिट्टी सी महकाती थी
एक बच्चे की मुस्कान।
कागज़ के जहाज बनाकर
कोठे पर से उन्हें उड़ाकर
आसमानों को तकती थी
एक बच्चे की मुस्कान।
घर का कुछ सामान तोड़कर
कच्चे कदमों से दौड़कर
माँ के दामन में मुस्काती
एक बच्चे की मुस्कान।
कच्चे कदम अब बड़े हो गए
हालात अभी कुछ कड़े हो गए
जीत दौड़ में कहीं खो गयी
उस बच्चे की मुस्कान।


