मैं और मेरा मकान

बिल्कुल एक से हैं हम

जीर्ण होते रहे हैं सदा

जाड़े की ठंडी हवाएं

भेद कर निकल जाती हैं

बात-बेबात मेरी आँखें

बरस पड़ती हैं यूँ ही

और मकान की छत भी

रोने लगती है मेरे साथ

अब बस इंतजार है

किसी तूफान आने का

कि मिट्टी में मिल जाए

ये दोनों पुराने ढांचे।