एक ख़त लिखूं मैं नाम तेरे
करवट बदलती रातें हों
मेरी-तकिये की बातें हों
कुछ भीगा हुआ रुमाल हो
एक मौन हुआ सवाल हो।
ज़रा चाँद-'सूरज' का ज़िक्र हो
कल फिर मिलने की फिक्र हो
एक मुस्कान की फरमाइश हो
कुछ वादों की आज़माइश हो।
कल के सपनों के हाल हों
कुछ बेतुके से ख़याल हों
तुम्हारे कदमों की आहट हो
ज़रा सा छूने की घबराहट हो।
कभी वियोग की तड़प हो
अपने ही साये से झड़प हो
पीड़ा का एक धीमा राग हो
स्याही पर आँसू का दाग हो।
बस सपना ये कभी सच हो जाये
कि एक ख़त लिखूं मैं नाम तेरे।


