*कुमार जी की इस कविता से प्रेरित हो एक छोटा सा प्रयास किया*


हो गुलाब की पंखुड़ी सी,

हो पीपल की निर्मल छाया तुम

कली खिली हो किसी पुष्प की

बिल्कुल वैसी सुंदर हो तुम,

जैसे बगिया महके है वैसा सुंदर विला बनाऊंगा

तुम देना मेरा साथ तुम्हारे बिन मैं न जी पाऊंगा।।


तुम जैसे कोई सुंदरी हो

मैं भी ठीक ठाक सा दिखता हूँ,

तुम गर ताजमहल जैसी सुंदर

तो मैं भी लालकिले सा दिखता हूँ,

तुम नारी नही कलयुग जैसी

तुम सीता जैसी पावन हो,

जीवन के स्वर्णिम पल में जन्मी

एक गुड़िया सी मनभावन हो,

इसीलिए खुद से ज्यादा तुम पर प्यार लुटाऊंगा

तुम देना मेरा साथ तुम्हारे बिन मैं न जी पाऊंगा।।


तुम आओगी जब दुल्हन बन,

घर स्वर्ग सा अपना चमक उठेगा

जब पाँव में घुंघरू बजेगी छनछन,

हर कोना घर का चहक उठेगा

होगी जब शयनकक्ष में बाह में लिपटी,

मन उस रात चांदनी मचल उठेगा

गर पाँव चलेंगे साथ हमारे,

हर कदम शान से महक उठेगा

तो हाथ मे रखकर हाथ तुम्हारा अपना परिवार बनाऊंगा

तुम देना मेरा साथ तुम्हारे बिन मैं न जी पाऊंगा।।


मैंने रखे सब अन्तस में,

उपहार जो तुमने मुझको सौंपे

मैं माँ हिंदी का एक सिपाही,

गीत तभी तो तुम्हे हैं सौपे

गीतों में खाई जो कसमे,

तोड़ू बोलो भला कैसे

जो वादे किए थे हमने मिलकर

भूलूँ बोलो भला कैसे,

तो गीतों में लिखी सारी बाते सच कर के मैं दिखाऊंगा 

तुम देना मेरा साथ तुम्हारे बिन मैं न जी पाऊंगा।।


*मानवेन्द्र चौहान मानू*

*उन्नाव*