शेर जैसी है ज़िन्दगी मेरी कोई  किताब नहीं सवाल-इ-ज़िन्दगी का कही कोई जवाब नहीं तन्हाई बस गयी है मुझमे बिमारी की तरह एक ऐसी बीमारी जिसका कही कोई इलाज़ नहीं गम के साथ मैंने ऐसी रस्मे निभाई जिन रस्मो का कही कोई रिवाज़ नहीं मेरा हर अपना छोड़ गया तन्हा मुझे पर मेरा गम मुझसे बिलकुल नाराज़ नहीं प्यार को सबने एक गुनाह माना है इसे अपनाये ऐसा कही कोई समाज नहीं गहरी लगी चोट मेरे दिल को तो क्या हुआ मैं किसी के प्यार का मोहताज़ नहीं