न जाने क्या हो रहा है आजकल जिसे देखो वो ही रो रहा है आजकल पैसा तरक्की जमीन जायदाद इन्ही खयालो में जहन खो रहा है आजकल आसमान में भी हलचल दिखाई नहीं पड़ती शायद वो मालिक भी  सो रहा है आजकल कहलाता है जो अन्नदाता देश का किसान ही रोटी को रो रहा है आजकल पढाई नौकरी क़र्ज़ हो या ज़िन्दगी का हर कोई बोझ ढो रहा है आजकल परयो में अपनों को ढूंढ रहे है "प्रीत"  अपनों से हर कोई दूर हो रहा है आजकल