जो कुछ भी हुआ वो कुछ जानता नहीं, फँसा के मुझको वो अब पहचानता नहीं

सहारा जिसका कि मैं फिर उठ चला, मेरा साथी वो अब मुझे संभालता नहीं

नाराजगी ऐसी कभी हमने देखी न तेरी, रूठा है कुछ ऐसे कि अब मानता नहीं

सखा भी मेरा वो मेरा शत्रू भी वही, सिवा उसके अपना और कोई नहीं,

लाख मिले मुझको लोग कई बार, तेरे बिना है कि दिल मानता नहीं

जो कुछ भी हुआ वो कुछ जानता नहीं, फँसा के मुझको वो अब पहचानता नहीं