कहाँ तक को जाती है ये लंबी डगर,
मुझे तो बस जाना है प्रिये के नगर..
कट गई उम्र यूँ ही चलते चलते हमारी,
जाने कितना है मुश्किल ये छोटा सफ़र
एक ख्वाहिश ही थी पर नहीं थी खब़र
मिली थी सरे आम जो उनसे नज़र
सज गए कई सपने भी मेरे खूबसूरत
हो गया हम पर भी इश्क का ये असर
जुदा होना भी वफा का ही दस्तूर है
पास है भी मगर वो बड़ी दूर है
बुझ गया है उम्मीदों का अंतिम दिया,
जाने हमने क्या इतना बुरा है किया
