अजीब सी जिद्द है इस जिदंगी की
जब मुस्कराने की वजह तक नहीं होती तब हसने को मजबूर कर देतीं हैं ||
कभी मन को उड़ा देती है, तो कभी दिल को रुला देती है ||
कभी किसी ओर कि जिदंगी कि वजह बन जाती है, तो कभी किसी कि जिदंगी की कतगीर ||
कभी किसी कि ऑखो का काटा तो कभी किसी कि ऑखो का तारा बनाकर छोड़ देती है॥
कभी सब को अपनी पनाह में ले लेती है
और कभी खुद ही बेपनाह हो जाती है
कभी खुद ही बेपनाह हो जाती है||
मानसी मेहता


