कल रात
कल रात की बताऊँ एक बात
जब मैं रसोई में पकड़ा गया, रंगे हाथ, आधी रात
हुआ कुछ यूँ कि
शाम को खाने के बाद भी भूख लग गयी
सोने गया और देखते रहा कि श्रीमती जी की आँख नहीं लगी या लग गयी
कमरे की लाइट जला एक दो चक्कर कमरे में लगाया
नहीं हुई कोई आहट तो चुपचाप रसोई में जाने का मन बनाया
चुपचाप दबे पाँव रसोई तक आया
डब्बा खोला मिठाई का और दो पीस पेठा हाथ में रखा और दो मुँह में दबाया
तभी अचानक मुझे छींक आयी
मम्मी हड़बड़ा के उठ अपने कमरे से किचन में आयी
मुझे देख उन्हें बड़ी हंसी आयी
उधर श्रीमति जी भी कमरे से बाहर आयी
दोनो ने पूछा आधी रात क्या कर रहे किचन में ?
और यह क्या पेठे हाथ में और मुँह में ?
भोजन में क्या तुम्हें सब्ज़ी नहीं भाई ?
तरबूज़ की प्लेट की भी कर गए थे सफ़ाई ?
समझ गया था मैं, आज थी शामत मेरी आयी
सोचने लगा क्या दूँ अब मैं सफ़ाई ?
यह आधी रात उठ किचन में जाना
और पेठे की चोरी पड़ गयी भारी मेरे भाई !


