शांतनु कि इस उदासी का तो कोई हल नहीं.
जा चुकी है गंगा अब तो, देवव्रत्त है पास में
शांतनु की जो नजर फिर , सत्यवती पर आ गयी..
भूलकर वो पिछली बातें, प्रेम में फिर पड़ गए
आई जब यह बात , कन्या के पिता के सामने
बोले वह फिर शांतनु से .. ...बोले वह फिर शांतनु से..
कन्या तुम को सौंप दूंगा, पहले मुझको दो वचन
होगा उसका पुत्र ही , साम्राज्य का आधिपति...
बात कैसे उनकी हाय ,शांतनु यह मान लेते
देवव्रत से किस तरह वो इस तरह अन्याय करते
शोक में वह फिर से आए, नैन अश्रु से भिगाये...
बात यह दिल में छुपाए , शोक में डूबे रहे
कैसे अब किसको बताएं , द्वंद मन में जो चल रहा
हो रहा प्रारंभ देखो , महाभारत का रण रहा... ..
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