शांतनु की यह व्यथा, जब ज्ञात देवव्रत को हुई

थोड़ा वो लज्जाए खुद से और ग्लानि भी हुई 

खुद ही में कारण बना ,अपने पिता के शोक का

शूल जैसा खुद पिता के , पैर में आकर चुभा॥ 


वो ही तो महाराज मेरे , और पिता भी वो ही है

अब मेरा कर्तव्य है , इतना ही केवल बस यहां

शोक से बाहर निकालूं , राज्य और महाराज को

सोच कर वह चल दिए , घनघोर आधी रात को॥ 


बोले वह कन्या पिता से.... 

आया हूं हस्तिनापुर से , नाम देवव्रत है मेरा

देवी गंगा पुत्र हूं , और शांतनु मेरे पिता

उनके दुखों के सूर्य को  , अस्त अब कर दीजिए

महाराज हेतु कन्या का , अब हाथ मुझको दीजिये॥ 


फिर से बोले देवव्रत अब.... 

जो भी शंका हो कहो, मैं हूँ यही पर ही खडा़

मन के अपने द्वार खोलो , कह भी दो जो मन में है... 

अपने भीतर के सभी, प्रश्नों को बाहर लाओ तुम

 मौन क्यों हो खुल के बोलो, मुझको सब बतलाओ तुम