वह निरीह निर्बल निश्छल ,

नयनों से कुछ कहती हैं ।

उसके तन के चिथडे कपड़ों में,  

मानवता प्रतिबिम्बित होती हैं ।

कर को आगे करके गीत गाते पथ पर, 

आगे बढ़ती जाती है ।

उसके खुशी के गीतों में, 

अथाह वेदना झलकती है ।

कुछ ललचायी गीध सी आंखें,  

उसके तन को इस कदर घूरती है ।

मानो बगुले के आगे,  

खुद मछली आ गिर पड़ती हैं ।

कुछ उसके दीन दशा पर ,

मन ही मन रो पड़ते हैं ।

कुछ उसके गीतों पर, 

व्यंग्य कसा करते हैं ।

वह उनके व्यंग्य भरी निष्ठुर बातों का ,

सम्मानित उत्तर देती हैं ।

कटुता को बदल सरलता में, 

सबको निशब्द कर देती हैं ----------

          मनोज मिश्रा