जो आखों में है चेहरे पर नहीं है
कहीं ये हँसी तेरा गम तो नहीं है
बचपन से ही तूने देना है सीखा
दर्द तुझको हुआ जख्म होता किसी का
जमाने के गम तूने खुद में समेटा
कष्ट सबके हरे है पिता हो या बेटा
कहीे अपनो से तुझको भरम तो नहीं है।
कहीं ये हँसी तेरा गम तो नहीं है।।
किसकी जरूरत क्या तू सब जानती है
सभी की खुशी की दुआ मांगती है
दर्द किसको कहां ये तुझको पता है
जो रिश्तो को बांधे तू वो लता है
कहीं खुदा का ये तुझ पे करम तो नहीं है।
कहीं ये हँसी तेरा गम तो नहीं है।।
काम कितना भी हो तू थकती नहीं है
बीमार होकर भी तू रूकती नहीं है
घर में सबको सुला के तू जग रही थी
हाथ अपने कमर पर तू रख रही थी
कहीं तेरी तबियत नरम तो नहीं है।
कहीं ये हँसी तेरा गम तो नहीं है।।
बादल गमो के तुझको ढ़कते रहे हैं
हर रिश्ते सदा तुझको डसते रहे है
जहर जिन्दगी का हँस के पीती रही हो
झोलीयां सबकी खुशियों से भरती रही हो
कही खुशियों से आंखे तेरी नम तो नहीं है।
कहीं ये हँसी तेरा गम तो नहीं है।।
करूणा सभी पर दिखाती हो तुम
ममता सभी पर लुटाती हो तुम
हर रिश्ता बखुबी निभाती हो तुम
गैरो को भी अपना बनाती हो तुम
कहीं दया भाव तेरा धरम तो नहीं है।
कहीं ये हँसी तेरा गम तो नहीं है।।
लोगो ने ताने सुनाये है तुमको
खुशियों में भी रूलाया है तुमको
खुशी जिन्दगी भर पायी नहीं हो
दुख अपना किसी से जतायी नहीं हो
कही हर जख्म का तू मरहम तो नहीं है।
कहीं ये हंसी तेरा गम तो नहीं है।।
सभी के दुखो को अपना मानती हो
रिश्ते को निभाने की कला जानती हो
हाल सबके दिलो का तुम जानती हो
हर मर्ज की तुम दवा जानती हो
कहीं रिश्तो से तेरा वहम तो नहीं है।
कहीं ये हंसी तेरा गम तो नहीं है।।
तूने चाहा जिसे ठुकराया उसी ने
जिन्दा जलाया तुझे हर किसी ने
तू जरूरत है सबकी पर जरूरी नहीं है
रिश्ता निभाना तेरी मजबुरी नहीं है
कहीं जिन्दगी से तेरी कसम तो नहीं है।
कहीं ये हंसी तेरा गम तो नहीं है।।
MANOJ KUMAR MISHRA


