कभी तनहाई में जब
याद गुजर जाता है।
दिल में लगे जख्मों का
दर्द उभर आता है।।
लहरे तो समन्दर
के साथ रहती है।
साहिल को छूकर
दूर चली जाती है।
समन्दर साहिलो से
ऐसे नहीं टकराता है।
कभी तनहाई में...............
जख्म और दर्द का
जीवन से गहरा नाता है।
दर्द जब इन्सान की
हद से गुजर जाता है।।
तभी दर्द को अपना
औकात समझ आता है।।
कभी तनहाई
में..................
हवायें तुझे छूकर
जब मेरे पास आती है।
मुझे तेरी यादों मे
दूर बहा ले जाती है।।
इन हवाओं को भी
मेरा दर्द समझ आता है।
कभी तनहाई में.............
तेरी यादें मुझे अक्सर
रूला देती है।
रात में तुझको सपने
में बुला लेती है।।
नीेंद खुलते ही
हकीकत समझ आता है।।
कभी तनहाई में.............
मनोज मिश्रा


