दिल जाना चाहता है कहीं दूर जहाँ हो नूर
नूर हो खुले आसमान का
पेड़-पर्वत नदियों का , खिलखिलाती वादियों का
बसता हो जिनमें सुकून, ऐसी हो फ़िज़ा वहां की
कि मिल जाये चैन, छा जाए सुरूर
दिल जाना चाहता है कहीं दूर जहां हो नूर
दूर इतना की जहाँ ना हो
शहर सी भागती-दौड़ती-रौंदती ज़िन्दगी
ना कोई आपा-धापी,
धर्म का पाखण्ड जाति-पाति
जहां घुली हो हवाओं में सिर्फ बंदगी
नफ़रतें हो दफ़न,मुस्कुराती हो ज़िन्दगी
कुछ ऐसा हो दस्तूर
दिल जाना चाहता है कहीं दूर जहां हो नूर
हो रंगत-संगत वहां की ऐसी
चहचहाती महकती खुशनुमा सुबह जैसी
जो कराये जगमगाते उत्सव का सा एहसास,
भर दे 'उत्साह-उमंग' हो साँझ वैसी
निर्मलता,शीतलता,सुस्वप्नों से सुसज्जित हो रैन प्यारी
हर दरिद्रता से परे हों सब,
मिलें सभी को खुशियाँ भरपूर
दिल जाना चाहता है कहीं दूर जहां हो नूर
©®Manjul Manocha©®


